चुनाव जीत रही है बीजेपी लेकिन क्या राहुल गांधी हो रहे हैं मजबूत?
Congress leader Rahul Gandhi in Rajasthan. (Image INC India)
By गुलशन राय खत्री
दिल्ली से बंगाल तक क्षेत्रीय दलों की कमजोर होती पकड़ ने राहुल गांधी को विपक्ष का सबसे बड़ा राष्ट्रीय चेहरा बना दिया है, 2029 से पहले चुनौती देने वाला कोई मजबूत विकल्प नहीं दिख रहा।
New Delhi, June 2, 2026 — हालांकि ये सुनने में अजीब लगेगा कि क्या राज्यों में लगातार बीजेपी की जीत से राहुल गांधी को मजबूती मिल रही है ? लेकिन ये वाकई सही बात है। दरअसल, दूर से देखने में लगता है कि राज्यों में बीजेपी की जीत से कांग्रेस का नुकसान हो रहा है लेकिन ये सिर्फ उन राज्यों तक ही सीमित है, जहां कांग्रेस व बीजेपी का सीधा मुकाबला होता है। जिन राज्यों में क्षेत्रीय दलों का दबदबा है, वहां बीजेपी की जीत से कांग्रेस को परोक्ष रूप से फायदा होता नजर आ रहा है।
अब तक इंडिया गठबंधन में या फिर स्वतंत्र तरीके से चुनाव लड़ रहीं इन पार्टियों के नेताओं को लग रहा था कि अगर राज्य में उनका दबदबा कायम रहा तो आगे चलकर 2029 तक वे राष्ट्रीय स्तर पर अपनी भूमिका निभा सकते हैं यानी उन्हें लग रहा था कि वे राष्ट्रीय स्तर पर गैर बीजेपी मोर्चे के दलों का नेतृत्व कर सकते हैं। लेकिन अब अपने ही राज्यों में हार के बाद अब उनकी ये हसरत पूरी होती नजर नहीं आ रही।
दरअसल, लोकसभा चुनाव में लगातार तीसरी बार बीजेपी के हाथों मात खाने के बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल खड़े होने शुरू हो गए थे। इसी से ही क्षेत्रीय दलों के नेता खुद को आगे चलकर राहुल गांधी वाली भूमिका में देखने लगे। इनमें ममता बनर्जी से लेकर अरविंद केजरीवाल तक शामिल हैं।
दिल्ली में लगातार चौथी बार सत्ता में आने की उम्मीद लगाए अरविंद केजरीवाल को पिछले साल ही झटका लगा और उनकी पार्टी सत्ता से बाहर हो गई। अब पंजाब में उन्हें अस्तित्व की लड़ाई लड़नी पड़ेगी। अगर पंजाब की सत्ता भी उनके हाथ से निकल गई तो उनके लिए राष्ट्रीय स्तर पर तो क्या अपनी पार्टी को बचाए रखना ही मुश्किल होगा।
अरविंद केजरीवाल के बाद राजनीतिक तौर पर ममता बनर्जी ऐसी नेता हैं, जिनके बारे में चर्चा की जा रही थी कि वे आगे चलकर राषट्रीय स्तर पर गैर बीजेपी मोर्चे का नेतृत्व कर सकती हैं।
कई राजनीतिक विश्लेषकों को तो लग रहा था कि अगर कांग्रेस ने उनका नेतृत्व स्वीकार नहीं किया तो वे तीसरा मोर्चा बनाकर भी कांग्रेस के लिए सरदर्द बन सकती हैं। लेकिन इस साल पश्चिम बंगाल में जिस तरह से बीजेपी ने बाजी पलटी है, उसके बाद अब ममता बनर्जी खुद ही राजनीतिक तौर पर कमजोर हो गई हैं।
अगर उनकी पार्टी में सेंध लगती है तो आने वाले वक्त में उन्हें खुद ही कांग्रेस और राहुल गांधी के बैनर तले बने मोर्चे में आना पड़ेगा। शरद पवार गुट की राष्ट्रवादी कांग्रेस पहले ही कमजोर हो चुकी है और खुद शरद पवार की भी इतनी उम्र हो चली है कि वे इतनी सक्रिय भूमिका नहीं निभा सकते।
इससे पहले ओडिसा में बीजू जनता दल भी सत्ता से हाथ खो बैठा है और बिहार में राष्ट्रीय जनता दल भी एक बार फिर सत्ता से बहुत दूर है। अगर अन्य क्षेत्रीय दलों की बात करें तो अकाली दल, शिवसेना (उद्धव गुट),नैशनल कांफ्रेंस, झारखंड मुक्ति मोर्चा जैसे दलों की फिलहाल राष्ट्रीय स्तर पर भूमिका नजर नहीं आती।
अब सिर्फ उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ही है, जो फिलहाल क्षेत्रीय दलों में सबसे मजबूत नजर आ रही है। लेकिन उसका आधार ऐसा नहीं है कि वह इंडि गठबंधन में राहुल गांधी को चुनौती दें।
हाल ही में तमिलनाडु में उभरी टीवीके जरुर मजबूत दिख रही है लेकिन वो अभी नई पार्टी है और फिलहाल राष्ट्रीय स्तर पर कोई भी पार्टी उनका नेतृत्व स्वीकार नहीं करेगी।
ऐसे में जाहिर है कि गैर बीजेपी दलों के मोर्चे का राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस और राहुल गांधी को चुनौती देने वाला अब कोई क्षेत्रीय दल नहीं है। इस समय जो क्षेत्रीय पार्टियां गठबंधन में सत्ता में हैं, उनमें से अगर पूर्वोत्तर के राज्यों को छोड़ दें तो आंध्रप्रदेश की तेलगुदेशम पार्टी, बीजेपी के साथ गठबधन में है।
जबकि झारखंड मुक्ति मोर्चा, टीवीके और नैशनल कांफ्रेंस का कांग्रेस के साथ गठबंधन है। जाहिर है कि हाल के वर्षों में हुए चुनाव में जिस तरह से बीजेपी ने क्षेत्रीय दलों को सत्ता से बाहर किया है, उसका फायदा राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस और राहुल गांधी को मिलता नजर आ रहा है। विपक्ष की राष्ट्रीय भूमिका में अब राहुल गांधी को किसी क्षेत्रीय दल से चुनौती मिलना फिलहाल मुश्किल लग रहा है।
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