By गुलशन राय खत्री
पंजाब विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही राजनीतिक दलों की नजर फिर डेरों पर टिक गई है। माना जाता है कि राज्य के कई क्षेत्रों में डेरों का सामाजिक और चुनावी प्रभाव राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।
New Delhi, May 22, 2026 — पंजाब विधानसभा चुनाव में अब कुछ ही महीने बचे हैं। इसके साथ ही पंजाब में राजनीतिक पार्टियां मुद्दों के साथ साथ डेरों(धार्मिक सामाजिक संगठनों) को लेकर भी अपनी रणनीति तैयार करने में जुट गई हैं। दरअसल, पंजाब की राजनीति में डेरों की भूमिका अहम मानी जाती है। इसकी वजह है कि डेरों के बड़ी संख्या में अनुयायी। यही अनुयायी वोटर भी हैं।
हालांकि डेरे अमूमन गैर राजनीतिक हैं लेकिन इसके बावजूद ये माना जाता है कि अगर डेरा प्रमुख अपने अनुयायियों को अगर संकेत भी दे देते हैं तो उनके अधिकांश अनुयायी उसी पार्टी के पक्ष में वोट करते हैं, जिनकी ओर उनके प्रमुख संकेत भर कर देते हैं। डेरों की ये भूमिका कई बार राजनीतिक समीकरण भी उलट पलट देती हैं। यही वजह है कि राजनीतिक दल इस कोशिश में रहते हैं कि डेरों की ओर से उनके पक्ष में संकेत चला जाए।
बड़ी संख्या में अनुयायी : पंजाब में बड़ी संख्या में डेरे हैं और इनमें से कुछ के अनुयायियों की संख्या तो लाखों में ही है। पंजाब में लगभग 32 फीसदी आबादी दलित वर्ग की है। डेरे सबसे अधिक इसी वर्ग के लोगों को प्रभावित करते हैं। माना जाता है कि पंजाब में एक बड़ी आबादी के लोग किसी न किसी डेरे से जुड़े होते हैं। डेरा प्रमुख आध्यात्मिक गुरु हैं, जो लोगों को प्रवचन भी देते हैं और बिना किसी जात पात के उनके लिए सामाजिक कार्य भी करते हैं।
इन डेरों के अनुयायियों की बड़ी संख्या ही राजनीतिक दलों को डेरों की ओर आकर्षित करती है। माना जाता है कि डेरों की पंजाब के लगभग 12 हजार गांवों तक सीधी पहुंच है और यही नहीं, डेरों की वजह से 40 से 50 विधानसभा सीटों पर असर पड़ता है। इनमें सबसे अधिक दोआबा और मालवा इलाकों में हैं। माझा क्षेत्र में हैं लेकिन प्रभाव सीमित है।
पंजाब में जिन डेरों का सबसे अधिक जिक्र होता है, उनमें डेरा सच्चा सौदा, राधा स्वामी सत्संग ब्यास, डेरा सच्चखंड बल्लां, निरंकारी सत्संग, डेरा ढक्की साहिब और दिव्य ज्योति जागृति संगठन आदि शामिल हैं। हर डेरे का अलग अलग क्षेत्रों में असर है। मसलन डेरा सच्चा सौदा का असर होशियारपुर, बठिंडा बेल्ट में है जबकि राधा स्वामी सत्संग का असर पटियाला, अमृतसर आदि इलाकों में माना जाता है। इसी तरह कुछ डेरों का प्रभाव जालंधर, मुक्तसर, मलोट और आसपास के इलाकों में भी माना जाता है।
पंजाब की राजनीति को जानने वालों का कहना है कि इक्का दुक्का को छोड़ दें तो कभी भी इन डेरों की ओर से किसी राजनीतिक दल के पक्ष में वोट करने या न करने के बारे में कभी भी खुली अपील नहीं की जाती। यही वजह है कि डेरों की ओर से हमेशा खुद को गैर राजनीतिक बताया जाता है।
लेकिन राजनीतिक जानकारों का कहना है कि ऐसा नहीं है। डेरा प्रमुख चुनाव से ऐन पहले गुप चुप तरीके से इस तरह से संकेत देते हैं कि उनके अनुयायियों तक पहुंच जाए कि डेरा प्रमुख किस राजनीतिक दल को पसंद करते हैं। डेरों का राजनीतिक दलों पर कितना असर है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बार बार बेल मिलने की आलोचना के बावजूद डेरा सच्चा सौदा प्रमुख को सजा होने के बावजूद कई बार पेरोल मिल जाती है।
यही वजह है कि सभी राजनीतिक दलों की ओर से कोशिश होती है कि वे अधिक से अधिक डेरा प्रमुखों को अपने पाले में ले आएं ताकि उनके अनुयायियों के तौर पर उन्हें एकमुश्त वोट बैंक मिल सके।
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