पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी राज्यसभा सांसदों के सहारे नए राजनीतिक समीकरण बनाने में जुटी है। लेकिन क्या किसान आंदोलन की यादें और AAP की मजबूत पकड़ उसके रास्ते की सबसे बड़ी बाधा बनेंगी?
By गुलशन राय खत्री
New Delhi, May 12, 2026 — पश्चिम बंगाल में बड़ा उलटफेर करने के बाद अब बीजेपी की नजरें पंजाब पर हैं। अगले साल के शुरूआत में ही पंजाब में विधानसभा चुनाव होने हैं। इससे पहले इसी माह पंजाब में स्थानीय निकायों के भी चुनाव होने जा रहे हैं। हालांकि अब तक पंजाब के मामले में बीजेपी को बड़ा खिलाड़ी नहीं माना जा रहा था लेकिन जिस तरह से आम आदमी पार्टी के राज्यसभा के 8 सदस्यों ने पाला बदलकर बीजेपी का दामन थाना है, उससे ये कयास लगाए जाने लगे हें कि बीजेपी की पंजाब में भी कुछ ‘बड़ा’ करने की प्लानिंग है।
लेकिन क्या सिर्फ राज्यसभा सांसदों के जरिए विधानसभा चुनाव में बड़ा उलटफेर हो सकता है ? इसकी संभावना बहुत कम है लेकिन इतना जरुर है कि बीजेपी, कांग्रेस और आप छोड़कर आए नेताओं के भरोसे इस बार अगर सत्ता न भी हासिल कर सके लेकिन वह अपनी सीटें जरुर बढ़ाना चाहेगी और कोशिश करेगी कि वह किंगमेकर बन जाए।
बीजेपी को लग रहा है कि कांग्रेस छोड़कर आए कैप्टन अमरिंदर सिंह और सुनील जाखड़ के अलावा आम आदमी पार्टी से हाल ही में बीजेपी में आए नेता, उसे सत्ता के नजदीक ले जाने का आधार बन सकते हैं। उसकी नजर शहरी इलाकों खासतौर पर दोआबा और माझा इलाके की सीटों पर हैं। लेकिन इसके बावजूद बीजेपी के लिए राह उतनी आसान होने वाली नहीं है। कैप्टन अमरिंदर सिंह की अब काफी अधिक उम्र हो चुकी है और वे खुद ही पिछली बार अपना चुनाव हार गए थे। सुनील जाखड़ा जरुर बीजेपी के लिए हिंदू वोटरों को रिझाने में कामयाब होंगे। लेकिन दलित और जाट वोटरों के लिए उसके पास कोई विश्वसनीय चेहरे नहीं हैं।
अमूमन पंजाब में कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल व बीजेपी गठबंधन के बीच मुकाबला होता रहा है लेकिन 2017 के बाद आम आदमी पार्टी एक बड़े खिलाड़ी के तौर पर उभरी है। 2017 में आम आदमी पार्टी ने मालवा से 18 और दोआबा से दो सीटें जीतकर अपनी जोरदार मौजूदगी दर्ज करायी थी। पांच साल यही आम आदमी पार्टी ने सत्तारूढ़ कांग्रेस को हराकर अपनी सरकार बनाने में कामयाब हुई थी।
कौन से हैं बड़े खिलाड़ी : पंजाब में इस बार आम आदमी पार्टी, कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल, बीजेपी के अलावा बहुजन समाज पार्टी भी है। इस तरह से बहुकोणीय मुकाबला होने की वजह से राजनीतिक समीकरण जटिल हो गए हैं लेकिन इसके बावजूद ये माना जा रहा है कि मुख्य मुकाबला आम आदमी पार्टी और विपक्षी कांग्रेस के बीच होगा। इस सबके बावजूद बाकी दलों को नजरंदाज करना भी आसान नहीं है। पिछली बार आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच लगभग 20 फीसदी वोटों का अंतर था। इस बार कांग्रेस चाहेगी कि न सिर्फ ये अंतर समाप्त हो बल्कि वह फिर से सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरकर आए और सत्ता हासिल करे।
कांग्रेस की सबसे अधिक उम्मीदें आम आदमी पार्टी के भीतर उपजे मतभेद हैं। कांग्रेस नेताओं को लग रहा है कि आम आदमी पार्टी के आठ राज्यसभा सदस्य, बीजेपी में शामिल हुए हैं, भले ही उनकी पंजाब में कोई जमीनी पकड़ न हो लेकिन उनके पाला बदलने से एक तो पंजाब के लोगों के बीच आम आदमी पार्टी को लेकर सेंटीमेंट खराब हुआ है और दूसरे आम आदमी पार्टी को एंटी इनकमबेंसी का भी सामना करना पड़ेगा। इसके अलावा जिस तरह से आम आदमी पार्टी के नेताओं का रवैया रहा है और दिल्ली में उसे हार का सामना करना पड़ा है, उससे भी इस बार कांग्रेस ये उम्मीद लगाए बैठी है कि उसे बड़ी कामयाबी मिल सकती है।
कांग्रेस दोआबा और माझा को अपना गढ़ मानती है। पिछली बार भी जब कांग्रेस को 18 सीटें मिली थीं तो उसे इनमें से 9 सीटें दोआबा और 7 सीटें माझा से मिली थीं। मालवा क्षेत्र, कांग्रेस के लिए अभी भी कमजोर कड़ी है। पिछली बार भी यहां से कांग्रेस को 69 में से महज दो ही सीटें मिली थीं जबकि आप ने सबसे अधिक 66 सीटें जीती थीं।
कांग्रेस नेताओं को ये लगता है कि उसे पंजाब में बीजेपी से बड़ी चुनौती मिलने की संभावना नहीं है, क्योंकि पंजाब में अब तक लोग दिल्ली बार्डर पर हुए किसान आंदोलन को अब तक भूले नहीं हैं। ऐसे में बीजेपी की सीटे इस बार भी दहाई तक पहुंचना भी मुश्किल है। कांग्रेस नेताओं को लग रहा है कि अगर बीजेपी और शिरोमणि अकाली दल में अगर कहीं कोई समझौता हो गया तो जरुर ये गठबंधन कुछ सरदर्द बन सकता है। लेकिन फिलहाल तो दोनों ही दलों ने किसी तरह के गठबंधन से इनकार किया है।
आम आदमी पार्टी को योजनाओं पर भरोसा : आम आदमी पार्टी के लिए राह मुश्किल है लेकिन उसे उम्मीद है कि दिल्ली जैसी स्थिति यहां नहीं होगी। उसकी एक वजह तो यही है कि पंजाब में आम आदमी पार्टी ने अपनी योजनाओं को लागू किया है। दिल्ली में उसकी कई योजनाओं को केंद्र सरकार ने रोक दिया था और अंतिम दो वर्ष में तो उसके कई कार्य ही लटक गए थे। इसके अलावा वहां सरकार के मंत्रियों और खुद मुख्यमंत्री के रूप में अरविंद केजरीवाल को जेल तक जाना पड़ा था। जिससे उनकी छवि तो धूमिल हुई ही थी, साथ ही उन पर शराब घोटाले का भी आरोप लगा था। लेकिन पंजाब में ऐसी स्थिति नहीं है। ऐसे में आम आदमी पार्टी ये मान रही है कि भले ही उसकी कुछ सीटें कम हों लेकिन सत्ता उसे ही मिलेगी। उसे लगता है कि मालवा जैसा पंजाब का सबसे बड़ा क्षेत्र, उसका गढ़ बन चुका है और वही उसके लिए तुरुप का पत्ता बनेगा।
(Gulshan Khatri is a veteran political journalist, with decades spent in The Navbharat Time in New Delhi.)
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