By राजेश्वर जायसवाल
वायरल वीडियो, वीआईपी कल्चर और साजिश की राजनीति: मोतिहारी की घटना हमें क्या सिखाती है?
सोशल मीडिया के दौर में सच और झूठ के बीच की दूरी अब केवल कुछ सेकंड की रह गई है। एक वीडियो वायरल होता है, हजारों लोग उसे शेयर कर देते हैं, बड़े पत्रकार उसे चला देते हैं और देखते ही देखते वह “सत्य” की तरह स्थापित होने लगता है। लेकिन सवाल यह है कि अगर वह वीडियो सही हो, मगर उसका संदर्भ गलत हो, तब क्या होगा?
मोतिहारी का एक वीडियो इन दिनों इसी बहस के केंद्र में है। सोशल मीडिया पर इसे इस दावे के साथ वायरल किया गया कि यह हालिया घटना है, जिसमें किसी वीआईपी मूवमेंट के दौरान लोगों ने बैरिकेड तोड़े, हॉर्न बजाकर विरोध किया और वीआईपी संस्कृति के खिलाफ नाराजगी जताई। लेकिन स्थानीय स्तर पर सामने आ रही जानकारी कुछ और कहानी कहती है।
बताया जा रहा है कि यह वीडियो नया नहीं, बल्कि 4 अप्रैल 2026 का है, जब मोतिहारी में उपराष्ट्रपति का कार्यक्रम था और उसी दौरान लोगों की नाराजगी सामने आई थी। यानी वीडियो वास्तविक है, लेकिन उसका समय और संदर्भ बदलकर पेश किया जा रहा है।
यहीं से सवाल केवल एक वीडियो का नहीं रह जाता, बल्कि सूचना की विश्वसनीयता और डिजिटल राजनीति का बन जाता है।
भारत में वीआईपी कल्चर के खिलाफ नाराजगी नई नहीं है। आम आदमी पार्टी का उदय भी इसी विरोध की राजनीति से जुड़ा रहा। लोगों में यह भावना स्वाभाविक है कि लोकतंत्र में कोई भी नागरिक “लाट साहब” नहीं हो सकता। सड़कें बंद हों, आम लोगों को घंटों रोका जाए या किसी की जान पर बन आए — यह स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।
लेकिन दूसरी तरफ, वीआईपी कल्चर के वास्तविक विरोध को अगर पुराने वीडियो, भ्रामक दावों और सोशल मीडिया अभियानों के जरिए हवा दी जाए, तो यह लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करता है।
और चिंता की बात यह है कि ऐसे मामलों में कई बार बड़े मीडिया चेहरे भी बिना सत्यापन के वायरल सामग्री को आगे बढ़ा देते हैं। अगर किसी घटना की पुष्टि स्थानीय अखबारों, प्रशासन या प्रत्यक्षदर्शियों से नहीं हुई, तो उसे “तत्काल सत्य” मान लेना पत्रकारिता की बुनियादी कसौटी पर सवाल खड़े करता है।
सरकार को इस मामले की जांच करनी चाहिए कि पुराने वीडियो को नए संदर्भ में वायरल करने के पीछे कौन लोग हैं और उनका उद्देश्य क्या है। लेकिन इसके साथ समाज और मीडिया को भी आत्ममंथन करना होगा।
वीआईपी कल्चर का विरोध जरूरी है, लेकिन झूठ और भ्रम के सहारे नहीं। लोकतंत्र में सत्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना विरोध।
(यह एक विचार लेख है। व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं।)
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